खंड,खंड में बंटे पत्रकार संघ किस काम के ?

खंड,खंड में बंटे पत्रकार संघ किस काम के ?

बिलासपुर : सूचना GPM से है कि,

जीपीएम – क्या वाकई छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता करना जोखिम भरा हो गया है ? क्या आज के परिवेश में सच बोलना ,लिखना और दिखाना आसान है ? क्या शासन और प्रशासन पत्रकारों कीे सुरक्षा का ख्याल रख पाती है और क्या अब समाज के समक्ष सच्चाई लाना गुनाह हो गया है ? ये ऐसे कई सवाल हैं जो हर समय उठते रहते हैं लेकिन जवाब शायद ही मिल पाता हो ?

नए बने जिले जीपीएम में एक पत्रकार पर कुछ दबंग क्रेशर संचालकों ने जानलेवा हमला कर दिया और वह भी सिर्फ इस बात पर कि उस पत्रकार ने पहाड़ों के खतम होने की खबर चला दी । क्या ये इतनी बड़ी बात हो गई कि किसी की जान लेने की कोशिश की जाए ? यदि क्रेशर सहीं ढंग से चल रहे हैं तो फिर खबर छपने दो क्या होता ?  खबर के बाद हो सकता है जांच होती सहीं पाए जाने पर सब ठीक हो जाता और गलत खबर चलाने को लेकर क्रेशर संचालक पत्रकार को नोटिस भेज देते ? ओर भी प्रावधान है कानून में मान हानि का दावा कर सकते थे ?

लेकिन खबर से तिलमिलाए लोगों ने पत्रकार की गाड़ी को तीनों तरफ से रोककर जैसी घटना को अंजाम दिया है उसने प्रदेश में पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर दिया है । प्राप्त जानकारी के अनुसार अमरकंटक, मैकल पर्वत श्रृंखला में स्टोन क्रेशर संचालन और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर लौट रहे जिले के पत्रकार सुशांत गौतम पर हमला कर दिया गया।

[1/14, 10:49] सत्ता से सवाल(मीडिया): घटना में पत्रकार की गाड़ी का कांच तोड़ा गया, उन्हें चोटें आईं, जबकि उनके साथी का मोबाइल छीनकर संपर्क बाधित करने की कोशिश का भी आरोप है। यह मामला अब केवल पत्रकार पर हमले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे खनन-क्रेशर माफिया, प्रशासनिक चुप्पी और जंगलराज की मानसिकता से जोड़कर देखा जा रहा है। घटना के बाद प्रदेशभर में आक्रोश की स्थिति बन रही है और पत्रकार सुरक्षा एवं अवैध खनन पर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।
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पत्रकार सुशांत गौतम ने बताया कि वे 8 जनवरी 2026 को शाम करीब 6 बजे ग्राउंड रिपोर्टिंग से लौट रहे थे, तभी जीपीएम जिले के धनौली गांव के पास उनकी गाड़ी को योजनाबद्ध तरीके से घेर लिया गया। पीड़ित के अनुसार, एक कार आगे अड़ाई गई बगल में एक हाईवा खड़ा कर दिया गया पीछे से एक अन्य वाहन लगाकर रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया गया। इसके बाद गाली-गलौज और धमकियों का दौर शुरू हुआ और गाड़ी का दरवाजा खोलने का दबाव बनाया गया।

घटना के बाद पुलिस थाना में लिखित शिकायत दी गई, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई। थ्प्त् नंबर 0014/2026 थ्प्त् में भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ 126(2), 296, 115(2), 351(3), 324(4), 304, 3(5) लगाई गई हैं। यह मामला संज्ञेय अपराध के दायरे में आता है।

प्रशासन से कार्रवाई की मांग – मामले के बाद पत्रकार संगठनों और नागरिक समूहों में चर्चा है कि केवल थ्प्त् दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। मांग की जा रही है कि नामजद आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी हो क्षेत्र में संचालित सभी स्टोन क्रेशरों की विशेष जांच हो अवैध खनन/उत्खनन पर खनिज ,वन ,राजस्व की संयुक्त कार्रवाई हो पीड़ित पत्रकार एवं गवाहों को सुरक्षा दी जाए।

बड़ा सवाल, पत्रकार संघों की तथाकथित एकता के दावों पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह !

खंड खंड में थोड़ी थोड़ी संख्या बल के साथ गुटों में बंटे इतने सारे पत्रकार संगठन किस काम के ?जो किसी पत्रकार पर हुए हमले में इसलिए सक्रिय नहीं होते कि पीड़ित पत्रकार उनके संगठन का नहीं है ?इसलिए अधिकांश पत्रकार संगठन अपनी विश्वसनीयता, महत्ता खो चुके है ! ओर अपनी बारी के इंतजार में है ?,हालांकि, छत्तीसगढ़ में ऐसे जाबांज पत्रकारों की भी कोई कमी नहीं है जो सुनील नामदेव जैसे निडर, निर्भीक पत्रकार अकेले भूपेश बघेल की सता पलटने का साहस किए थे ?,

उस समय भी सुनील नामदेव अपनी जंग खुद अकेले लड़ा था ! एकता के अभाव में आज भी लगभग सभी पत्रकार खुद को अकेला महसूस करते है !,

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